संकल्प विधि / संकल्प मंत्र

( दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले

“ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे, भारतवर्षे, भरतखंडे, (अपने स्थान का नाम), मासे (अपने मास का नाम), शुक्ल/कृष्ण पक्षे, (तिथि) तिथौ, (वार) वासरे, (नक्षत्र) नक्षत्रे, (योग) योगे, (करण) करणे, एवं गुण विशेषण विशिष्टायां अस्यां (तिथि) तिथौ, (अपना नाम), (अपना गोत्र) गोत्रोत्पन्नः, अहं गृहे, (देवता का नाम) प्रीत्यर्थं, (पूजा/अनुष्ठान का उद्देश्य) करिष्ये।”

ऊँ: यह ब्रह्माण्ड की मूल ध्वनि है, जो सार्वभौमिक चेतना या ईश्वर को दर्शाती है।
विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः: विष्णु का तीन बार उल्लेख है, जो उनकी महत्ता और शक्ति को दर्शाता है।
श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य: ‘श्रीमद्’ धन और समृद्धि का प्रतीक है, ‘भगवतो’ भगवान को संबोधित करता है, और ‘महापुरुषस्य’ महान पुरुष या दिव्य शक्ति का उल्लेख करता है।
विष्णोराज्ञया: विष्णु के आदेश से।
प्रवर्तमानस्य: चालू या आरंभ हो रहा है।
अद्य: आज।
ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे: ब्रह्मा के दूसरे परार्ध में, यानी वर्तमान कल्प का संदर्भ।
श्रीश्वेतवराहकल्पे: श्वेतवराह कल्प का संदर्भ, जो वर्तमान कल्प है।
वैवस्वतमन्वन्तरे: वैवस्वत मनु के अंतराल में, जो वर्तमान मन्वंतर है।
अष्टाविंशतितमे कलियुगे: कलियुग का अष्टाविंशति (28वां) युग।
कलि प्रथम चरणे: कलियुग के पहले चरण में।
जम्बूद्वीपे, भारतवर्षे, भरतखंडे: भौगोलिक संदर्भ, जो प्राचीन भारत को दर्शाते हैं।
(अपने स्थान का नाम), मासे (अपने मास का नाम), शुक्ल/कृष्ण पक्षे, (तिथि) तिथौ, (वार) वासरे, (नक्षत्र) नक्षत्रे, (योग) योगे, (करण) करणे: ये खाली स्थान पूजा करने वाले व्यक्ति को अपने स्थान, समय, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, और करण के आधार पर भरने होते हैं।
एवं गुण विशेषण विशिष्टायां अस्यां (तिथि) तिथौ: इस विशेष तिथि पर जो गुण और विशेषण हैं।
(अपना नाम), (अपना गोत्र) गोत्रोत्पन्नः: पूजा करने वाले का नाम और गोत्र।
अहं गृहे, (देवता का नाम) प्रीत्यर्थं, (पूजा/अनुष्ठान का उद्देश्य) करिष्ये।: मैं अपने घर में, (देवता के नाम) की प्रसन्नता के लिए, (पूजा या अनुष्ठान) करने जा रहा हूं।

संकल्प कैसे लेते हैं ? 
पवित्री व त्रिकुशा – संकल्प करते समय पवित्री और त्रिकुशा धारण करना आवश्यक होता है। 
जल – संकल्प करने के लिये हाथ में जल होना अनिवार्य होता है। 
तिल – संकल्प करते समय तिल भी हाथ में रखना आवश्यक होता है। 
अन्य वस्तुएं – संकल्प के समय हाथ में रखने वाली अन्य आवश्यक वस्तुएं हैं – पान, सुपारी, अक्षत, पुष्प, चंदन, द्रव्य (रूपया) । 
विष्णु स्मरण – संकल्प करने से पूर्व भगवान विष्णु का स्मरण करना आवश्यक होता है। संकल्प करने के वाक्य या कालवर्णन – संकल्प वाक्य में सबसे पहले सृष्टि के आरम्भ से वर्त्तमान तक व्यतीत काल का उल्लेख करना अनिवार्य होता है। न्यूनतम मास-पक्ष और तिथि का उल्लेख होना ही चाहिये। 
परिचय – संकल्प वाक्य में संकल्प करने वाले का परिचय होना चाहिये, जैसे गोत्र और नाम का उच्चारण करना। उद्देश्य – संकल्प वाक्य में उद्देश्य का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये। किस कामना से कार्य कर रहे हैं या उस कार्य का क्या फल प्राप्त करना चाहते हैं यह उद्देश्य कहलाता है। कार्यावधि – जिस कार्य को करने जा रहे हैं उस कार्य की अवधि (कितने दिन/सप्ताह/मास) क्या होगी इसे स्पष्ट कर लेना चाहिये। 
कर्म – अंत में जो कार्य करने जा रहे हैं उस कार्य का उल्लेख करना चाहिये। 

लघु संकल्प मंत्र या अत्यंत संक्षिप्त संकल्प :

“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यैतस्य (रात मे : अस्यां रात्र्यां कहे) मासोतमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ गोत्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फल प्राप्तयर्थं, सकल मनोरथ सिध्यर्थं …………… ८ करिष्ये।” 

सरल संकल्प मंत्र :
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरूषस्य,विष्णुराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य (रात मे : अस्यां रात्र्यां कहे) ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेत वाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते ………… १ संवत्सरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ गोत्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फलप्राप्तये ग्रहदोष, दैहिक, दैविक, भौतिक – त्रिविध ताप निवार्णार्थं सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं मनसेप्सित फल प्राप्ति पूर्वक, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, सकल आधि, व्याधि, दोष परिहार्थं सकल मनोरथ सिध्यर्थं …………… ८ करिष्ये।” (१ संवत्सर का नाम, २ महीने का नाम, ३ पक्ष का नाम, ४ तिथि का नाम, ५ दिन का नाम, ६ अपने गोत्र का नाम, ७ ब्राह्मण शर्माऽहं, क्षत्रिय वर्माऽहं, वैश्य गुप्तोऽहं और शूद्र दासोऽहं कहें, ८ जो कर्म पूजा/जपादि करना हो उसका उच्चारण करे।) 

दृढ़ संकल्प मंत्र – बड़ा संकल्प वाक्य : 
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: । श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविशतितमे युगे कलियुगे कलिप्रथमचणे भूर्लोके भारतवर्षे जम्बूद्विपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तस्य अमुकक्षेत्रे अमुकदेशे अमुकनाम्निनगरे (ग्रामे वा) श्रीगड़्गायाः ………… (उत्तरे/दक्षिणे) दिग्भागे देवब्राह्मणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्यसमयतः ……… संख्या -परिमिते प्रवर्त्तमानसंवत्सरे प्रभवादिषष्ठि -संवत्सराणां मध्ये ………… नामसंवत्सरे, ………… अयने, ………… ऋतौ, ………… मासे, ………… पक्षे, ………… तिथौ, ………… वासरे, ………… नक्षत्रे, ………… योगे, ………… करणे, ………… राशिस्थिते चन्द्रे, ………… राशिस्थितेश्रीसूर्ये, ………… देवगुरौ शेषेशु ग्रहेषु यथायथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ………… गोत्रोत्पन्नस्य ………… शर्मण: (वर्मण:, गुप्तस्य वा) सपरिवारस्य ममात्मन: श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त्पुण्यफलावाप्त्यर्थं ममऐश्वर्याभिवृद्धयर्थं अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्त लक्ष्म्याश्चिरकाल संरक्षणार्थं सकलमन: इप्सितकामनासंसिद्धयर्थं लोके व सभायां राजद्वारे वा सर्वत्र यशोविजयलाभादि प्राप्त्यर्थं समस्तभयव्याधिजरापीडामृत्यु परिहारद्वारा आयुरारोग्यैश्वर्याद्यभिवृद्धर्थं तथा च मम जन्मराशे: सकाशाद्ये केचिद्विरुद्धचतुर्थाष्टमद्वादशस्थानस्थिता: क्रूरग्रहा: तै: सूचितं सूचयिष्यमाणञ्च यत्सर्वारिष्टं तद्विनाशद्वारा सर्वदा तृतीयैकादशस्थानस्थितवच्छुभफलप्राप्त्यर्थं पुत्रपौत्रदिसन्ततेरविच्छिन्न वृद्धयर्थम्! आदित्यादिन्नवग्रहानूकूलता सिद्धर्थम इन्द्रादि -दशदिक्पालप्रसन्नतासिद्धर्थम् आधिदैविकाधि भौतिकाध्यात्मिका त्रिविधतापोपशमनार्थं धर्मार्थकाममोक्षफलावाप्त्यर्थं यथाज्ञानं यथा मिलितोपचारद्रव्यै: ………… देवस्य पूजनं करिष्ये। तदड़्गत्वेन गणपत्यादि देवानां पूजनञ्च करिष्ये।

हेमाद्रि संकल्प प्रयोग – विस्तृत संकल्प

हेमाद्रि संकल्प का प्रयोग मुख्यरूप से प्रायश्चित्त, स्नान आदि के लिये ही पाया जाता है।

हेमाद्रि संकल्प मंत्र
ॐ स्वस्ति श्रीमुकुंद सच्चिदानंदस्य ब्रह्मणोऽनिर्वाच्य मायाशक्तिविजृंभिता विद्यायोगात् कालकर्म स्वभावाविर्भूत महत्तत्वोदिताहंकारोद्भूत वियदादि पञ्चमहाभूतेंद्रियदेवता निर्मिते अंडकटाहे चतुर्दशलोकात्मके लीलया तन्मध्यवर्तिभगवतः श्रीनारायणस्य नाभिकमलोद्भूत सकललोकपितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टिं कुर्वतस्तदुद्धरणाय प्रजापतिप्रार्थितस्य समस्त जगदुत्पत्तिस्थितिलय कारणस्य जगद्रक्षाशिक्षा विचक्षणस्य प्रणतपारिजातस्य अच्युतानंतवीर्यस्य श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य अचिंत्यापरिमितशत्क्त्या ध्येयमानस्य महाजलौघमध्ये परिभ्रममाणानामनेक कोटिब्रह्मांडानामेकतमे ऽव्यक्तमहदहंकार पृथिव्यप्तेजो वाय्वाकाशाद्यावरणैरावृते अस्मिन्महति ब्रह्मांडखंडे आधारशक्ति श्रीमदादिवाराहदंष्टाग्र विराजिते कूर्मानंत वासुकि तक्षक कुलिक कर्कोटक पद्म महापद्म शंखाद्यष्ट महानागौर्घ्रियमाणे ऐरावत पुंडरीक वामन कुमुदोंजन पुष्पदंत सार्वभौम सुप्रतीकाष्टदिग्गज प्रतिष्ठितानामतल वितल सुतल तलातल महातल रसातल पाताललोकानामुपरिभागे भूर्लोक भुवर्लोक स्वर्लोक महर्लोक जनलोक तपोलोक सत्यलोकाख्य सप्तलोकानामधोभागे चक्रवालशैल महावलयनागमध्य वर्तिनो महाकाल महाफणिराज शेषस्य सहस्रफणानां मणिमंडलमंडिते दिग्दतिशुण्डोत्तंभिते अमरावत्त्यशोकवती भोगवती सिद्धवती गान्धर्ववती कांच्यवंत्यलकावती यशोवती पुण्यपुरी प्रतिष्ठिते इंद्राग्नि यम निर्ऋति वरुण वायु कुबेरेशानेष्ट दिक्पाल प्रतिष्ठिते वरध्रुवाधर सोमपा प्रभंजनानल प्रत्यूष प्रभासाख्याष्ट वसुभिर्विराजिते हरत्र्यंबक रुद्र मृगव्याधापराजित कपालिभैरव शंभु कपर्दि वृषाकपि बटुरूपाख्यैकादश रुद्रैः संशोभिते रुद्रोपेंद्र सवितृ धातृत्वष्टर्यमेंद्रेशान भग मित्र पूषाख्य द्वादशादित्य प्रकाशिते यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान ससाध्यष्टाङ्ग निरत वसिष्ठ वालखिल्य विश्वामित्र दक्ष कात्यायन कौडिन्य गौतमाङ्गिरस पाराशर्यव्यास वाल्मिक शुक शौनक भरद्वाज सनक सनंदन सनातन सनत्कुमार नारदादि मुख्यमुनिभिः पवित्रिते लोकालोकाचल वलयिते लवणेक्षुरस सुरा सर्पि दधि क्षीरोदक युक्त सप्तार्णव परिवृते जंबू प्लक्ष शाल्मलि कुश क्रोञ्च शाक पुष्कराख्य सप्तद्वीपयुते इंद्रकांस्य ताम्रगभस्तिनाग सौम्य गंधर्व चारण भारतेति नवखंडमंडिते सुवर्णगिरि कर्णिकोपेत महासरोरुहाकार पंचाशत्कोटि योजन विस्तीर्ण भूमंडले अयोध्या मथुरा माया काशी कांच्यवंतिका द्वारावतीति सप्तपुरीप्रतिष्ठिते महामुक्तिप्रदस्थले शालग्राम शंभल नंदिग्राम त्रयविराजिते चंपकारण्य बदरिकारण्य दंडकारण्यार्बुदारण्य धर्मारण्य पद्मारण्य गुह्यारण्य जंबुकारण्य विंध्यारण्य द्राक्षारण्य नहुषारण्य काम्यकारण्य द्वैतारण्य नैमिषारण्यादीनां मध्ये सुमेरु निषधकूट शुभ्रकूट श्रीकूट हेमकूट रजतकूट चित्रकूट त्रिकूट किष्किंधश्वेताद्रिकूट हिमविंध्याचलानां हरिवर्ष किंपुरुषवर्षयोश्च दक्षिणे नवसस्रहृयोजन विस्तीर्णे भरतखंडे मलयाचल सह्याचल विंध्याचलानामुत्तरेण स्वर्णप्रस्थ चंडप्रस्थ सूक्तिकचंतक रमणक महारमणक पांचजन्य सिंहल लंकाऽशोकवत्यलकावती सिद्धवती गांधर्ववत्यादि पुण्यपुरी विराजिते नवखंडोपद्वीप मंडिते दक्षिणावस्थि रेणुकाद्वय सूकर काशी कांची कालि काल वटेश्वर कालंजर महाकालेति नवोपुरयुते द्वादशज्योतिर्लिंग गंगा गोदाक्षिप्रा यमुना सरस्वती नर्मदा तापी पयोष्णी चंद्रभागा कावेरी मंदाकिनी गोदावरी प्रवरा कृष्णा वेण्या भीमरथी तुंगभद्रा मलावहाः कृतमाला ताम्रपर्णी विशालाक्षी वंजुला चर्मण्वती वेत्रवती भोगावती विशोका कौशिकी गंडकी वासिष्ठी प्रमदा विश्वामित्री फल्गुनी चित्रकाश्यपी सरयू सर्वपापहाारिणी करतोया प्रणीता वज्रा वक्रगामिनी सुवर्णरेखा शोणा भवनाशिनी शीघ्रगा कुशावर्तिनी ब्रह्मानंदा महितनयेत्यनेक पुण्य नदीभिर्विलसिते ब्रह्मपुत्र सिंधु नदादि परम पवित्रजल विराजिते हिमवन्मेरु गोवर्धन क्रौंच चित्रकूट हेमकूट महेंद्र मलय सह्येन्द्र कीलपारियात्राद्यनेक पर्वतसमन्विते मतंग माल्य किष्किंध ऋष्यशृंगेतिमहानग समन्विते अंग वंग कालिंग काश्मीर कांबोज सौवीर सौराष्ट्र महाराष्ट्र मगध नेपाल केरलचोरल पांचाल गौड मालव मलय सिंहल द्रविड कर्नाटक ललाटक रहाटवरहाट पांड्य निषध मागध आंध्र दशाणभोज कुरु गांधार विदर्भ विदेह बाल्हीक बर्बर कैकेय कोसल विराट्शूरसेन कोंकण कैकट मत्स्य भद्र पारसीक खर्जूर यावन म्लेच्छ जालंधरेति सिद्धवत्यन्य देशविशेष भाषा भूमिपाल विचित्रिते इलावृत्त कुरुभद्राश्वकेतुमाल किंपुरुष रमणक हिरण्मयादि नववर्षाणां मध्ये भरतखंडे कोकंत हिरण्यशृङ्गा कुब्जार्बुदमणिकर्णीवट शालग्राम सूकर मथुरा गया निष्क्रमण लोहार्गल पोतस्वामि प्रभास बदरीति चतुर्दश गुह्यविलसिते जंबुद्वीपे कुरुक्षेत्रादि सम भूमध्यरेखायाः (अमुक) दिग्भागे कुलमेरोर्दक्षिण दिग्भागे विंध्यस्य (अमुक) दिग्भागे मत्स्य कूर्म वराह नृसिंह वामन परशुराम राम कृष्ण बुध कल्कीति दशावताराणां मध्ये बौद्धावतारे गंगादिसरिद्भिः पाविते एवं नव सहस्रयोजन विस्तीर्णे भारतवर्षे निखिलजन पावन परम भागवतोत्तम शौनकादि निवासिते नैमिषारण्ये आर्यावर्तांतर्गत ब्रह्मावर्तैकदेशे सूर्यान्वय भूभृत्प्रतिष्ठिते श्रीमन्नारायण नाभिकमलोद्भूत सकलजगत्स्रष्टुः परार्द्धद्वयजीविनो ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे एकपंचाशत्तमे वर्षे प्रथममासे प्रथमपक्षे प्रथमदिवसे अह्नो द्वितीये यामे तृतीये मुहूर्ते रथंतरादि द्वात्रिंशत्कल्पानां मध्ये अष्टमे श्वेतवाराहकल्पे स्वायंभुवादि मन्वंतराणां मध्ये सप्तमे वैवस्वत मन्वंतरे कृतत्रेताद्वापरकलि संज्ञकानां चतुर्णां युगानां मध्ये वर्तमाने अष्टाविंशतितमे कलियुगे तत्प्रथमे पादे श्रीमन्नृपविकमार्कात् श्रीमन्नृपशालिवाहनाद्वा यथा संख्यागमेन चांद्र सावन सौर नाक्षत्रादि प्रकारेणागतानां प्रभवादि षष्टि संवत्सराणां मध्ये (अमुक) नाम्नि संवत्सरे उत्तर/दक्षिण गोलावलंबिनि श्रीमार्तंडमंडले (अमुक) ऋतौ (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अमुक) नक्षत्रे (अमुक) योगे (अमुक) करणे (अमुक) राशिस्थे चंद्रे (अमुक)स्थे सूर्ये (अमुक)स्थे गुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथा स्थानस्थितेषु सत्सु एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभ-पुण्य तिथौ (अमुक) गोत्रः (अमुक) शर्माहं मम इह जन्मनि जन्मांतरे वा बाल्य यौवन वार्द्धक्यावस्थासु वाक्पाणि पाद पायुपस्थ घ्राण रसना चक्षुः स्पर्शन श्रोत्र मनोभि चरित ज्ञाताज्ञात कामाकाम महापातकोपपातकादि संचितानां पापानां ब्रह्महनन सुरापान सुवर्णस्तेय गुरुतल्पगमन तत्संगरूप महापातकानां बुद्धिपूर्वकाणां मनोवाक्कायकृतानां बहुकालाभ्यस्तानामुपपातकानां च स्पृष्टास्पृष्ट संकलीकरण मलिनीकरणापात्रीकरण जातिभ्रंशकरणविहिताकरण कर्मलोपजनितानां रसविक्रय कन्याविक्रय हयगो विक्रय खरोष्ट्रविक्रय दासीविक्रयाजादि पशुविक्रय स्वगृहविक्रय नीलीविक्रयाक्रेयविक्रय पण्यविक्रय जलचरादिजंतुविक्रय स्थलचरादिविक्रय खेच रादिविक्रय संभूतानां निरर्थक वृक्षच्छेदन ऋणानपाकरण ब्रह्मस्वापहरण देवस्वापहरण राजस्वापहरण परद्रव्यापहरण तैलादिद्रव्याप हरण फलाहरण लोहादिहरण नानावस्तुहरण रूपाणां ब्राह्मणनिंदा गुरुनिंदा वेदनिंदा शास्त्रनिंदा परनिंदाऽभक्ष्य भक्षणाऽभोज्य भोजनाचोष्य चोषणालेह्य लेहनापेय पानास्पृश्य स्पर्शनाश्राव्य श्रवणाहिंस्य हिंसनावंद्य वंदनाचिंत्य चिंतनायाज्य याजनापूज्य पूजन रूपाणां मातृ पितृ तिरस्कार स्त्रीपुरुष प्रीतिभेदन परस्त्रीगमन विधवागमन वेश्यागमन दासीगमन चांडालादिद्दीनजातिगमन गुदगमन रजस्वलागमन पश्वादिगमन रूपाणां, कूटसाक्षित्व पैशुन्य वादमिथ्यापवाद म्लेच्छसंभाषण ब्रह्मद्वेषकरण ब्रह्मवृत्तिहरण वृत्तिच्छेदन परवृत्तिहरणरूपाणां, मित्रवंचन गुरुवंचन स्वामिवंचनासत्यभाषण गर्भपातन पथितांबूलचर्वण हीनजातिसेवन परान्नभोजन गणान्नभोजन लशुनपलांडशृंजनभक्षण तालवृक्ष फलभक्षणोच्छिष्ट मार्जारोच्छिष्ट पर्युषितान्नभक्षण रूपाणां, पंक्तिभेदकरण भ्रूणहिंसा पशुहिंसा बालहिंसाद्यनेक हिंसोद्भूतानां, शौचत्याग स्नानत्याग संध्यात्यागौपासनाग्नित्याग वैश्वदेवत्याग रूपाणां निषिद्धाचरण कुग्रामवास ब्रह्मद्रोह पितृमातृद्रोह परद्रोह परनिंदात्मस्तुति दुष्टप्रतिग्रह दुर्जनसंसर्गरूपाणां, गोयान वृषभयान महिषयान गर्दभयानोष्ट्रयानाजयान भृत्याभरण स्वग्रामत्याग गोत्रत्याग कुलत्याग दूरस्थमंत्रण विप्राशाभेदनावंदिताशीर्वाद ग्रहण पतितसंभाषण रूपाणां पतितजनपंक्तिभोजनाहः संगमवृथामनोरथादिपापानां आत्मार्थं पाककरणैकाकी मिष्टान्न भोजन बालकैः सह भोजनात्मस्त्रिया सह भोजनेत्यादि प्रकीर्ण पातकानां, एतत्कालपर्यंतं संचितानां लघुस्थूलसूक्ष्माणां च निःशेष परिहारार्थं सहस्रगोदान कुरुक्षेत्रादि सर्वतीर्थ स्नानजन्य फलप्रात्यर्थं समस्तपितृणां आत्मनश्च विश्वादि लोकप्राप्तये अधीतानामध्येष्यमाणानां चाध्यायानां, स्थापनविच्छेद क्रोशघोषण दंतविवृति दुर्वृत्तद्रुतोच्चारित वर्णानां, पूर्वसवर्णानां गलोपलंबित विवृतोच्चारितवर्णानां, श्लिष्टास्पष्ट वर्णविघट्टनादिभिः पठितानां श्रुतीनां यद्यातयामत्वं तत्परिहारार्थम् अष्टात्रिंशदनध्यायाध्ययने रथ्यासंचरतः शूद्रस्य शृण्वतोध्ययने म्लेछां त्यजादेः शृण्वतोऽध्ययने अशुचिदेशेऽध्ययने आत्मनोऽशुचित्वेऽध्ययने अक्षरस्वरानुसार पदच्छेद कंडिका व्यंजन ह्रस्वदीर्घप्लुत कंठ तालु मूर्द्धन्योष्ठय दन्त्य नासिकानुनासिक रेफ जिह्वा मूलीयोपध्मानीयोदात्तानुदात्त स्वरितादीनां च व्यत्ययेनोच्चारमाधुर्याक्षर व्यक्तिहीनत्वाद्यनेक प्रत्यवाय परिहारपूर्वकं सर्वस्य वेदस्य सवीर्यत्व संपादनद्वारा यथावत्फल प्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवब्राह्मण सविता सूर्यनारायण सन्निधौ गंगाभागीरथ्याम् (अमुक तीर्थे/तडागे) प्रवाहाभिमुखम् …………………..

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