Monday, September 16, 2024

Snaan Vidhi (स्नान-विधि)

स्नान-विधि महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है. शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें. आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करेंI 1. vkRe&’kqf) % (i) पवित्र करण : (मार्जन) (अगले मंत्र को पढते हुए कुशा से अपने और पूजन सामग्री को जल से सींचे) ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुनातु ।। (ii) आचमन : ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः। (एक-एक कुल तीन आचमन करें हथेली पर कुछ बुंदे जल की रख कर मनीबंध से पीयें पानी बस गले तक ही जाये।) ॐ हृषीकेशाय नमः। (दाँये हाथ के अँगुष्ठ मूल से होठ पोंछे) ॐ गोविन्दाय नमः। (अपनी बाँई ओर हाथ धो ले) 2. पवित्री धारण (अंगूठी या कुश की पवित्र पहने अंगूठी पहले से पहनी हुई हो तो स्पर्श करें) ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्त ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयमः॥ 3. स्नान जल में गंगा आदि तीर्थों का आवाहन: ॐ नमो नारायणाय ea= ls rhFkZ dh dYiuk djsa] gkFk esa dq'kk ysdj 04 gkFk dk pkSdksj e.My cukdj mlesa ea=ksa }kjk xaxkth dk vkokgu djsa ! pkSdksj e.My cukdj xaxkth dk vkokgu %& गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥ गंगा सिंधु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया चर्मण्यवती वेदिका। क्षिप्रा वेत्रवती महासुरनदी ख्याता जया गण्डकी, पूर्णाः पूर्णजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तु मे मंगलम्।। नन्दिनी नलिनी सीता मालती च महापगा। विष्णुपादाब्जसम्भूता गंगा त्रिपथगामिनी।। भागीरथी भोगवती जाह्नवी त्रिदशेश्वरी। द्वादशैतानि नामानि यत्र यत्र जलाशय। स्नानोद्यत: स्मरेन्नित्यं तत्र तत्र वसाम्यहम्। नमो भगवते दशपापहराये गंगाये नारायण्ये रेवत्ये शिवाये दक्षाये अमृताये विश्वरुपिण्ये नंदिन्ये ते नमो नम:’ 4. संकल्प (हाथ में जल अक्षत आदि लेकर पूजा का संकल्प करें) “ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु, ॐ अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पै वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे इंदौर नगरे (……………………………………विक्रम संवत्सरे) ……………………..मासे………………….पक्षे………………..………तिथौ……………….वासरे..……….गोत्रोत्पन्नः……….वर्माऽहं मम आत्मनः श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं च श्रीमन्‌ …………. प्रीत्यर्थम्‌ ………….करिष्ये।'' इसके पश्चात्‌ हाथ का जलाक्षतादि छोड़ देवें। ॥ dq'kk gkFk esa ysdj Luku djsa ॥ गंगा गंगेति यो ब्रूयात, योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो, विष्णुलोके स गच्छति॥ तीर्थराजाय नमः । पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसिनः । त्राहि मां कृपया गंगे सर्वपापहरा भव ।। vkse~ ueks xaxk;S fo'o#i.;S ukjk;.;S ueks ue % A गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥

1 comment:

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